हमारे ऐसे भाग्य कहाँ??.......
एक दिन अकस्मात्
एक पुराने दोस्त से हो गयी मुलाक़ात,
हमने कहा ,नमस्कार
वो बोले,गजब हो गया यार.
क्या खाते हो?,
जब भी मिलते हो,पहले से डबल नज़र आते हो.
हमने कहा छोड़ो भी यार,ये बताओ तुम कैसे हो?
बोले- गृहस्थी का बोझ ढो रहे हैं,
जीवन की बगिया में आंसू बो रहे हैं,
कर्म के धागों से फटे भाग्य को सी रहे हैं,
और अपने ही राज्य में बिना चीनी की चाय पी रहे हैं..
हमने पूछा-ड़ायबटीज है क्या,
बोले-हमारे ऐसे भाग्य कहाँ?
ड़ायबटीज जैसे राज रोग तो बड़े लोगों को होते हैं,
हम जैसे कंगालों को तो सिर्फ दुःख-दर्द होते हैं,
फिर पूछा- तुम्हारे क्या हाल हैं?
हमने कहा-हमे तो ड़ायबटीज है,
तुम क्या जानो कितनी बुरी चीज है?
बोले- बुरी है तो मुझे दे दो,
पर मुझसे ये परेशानियाँ ले लो.
हमने कहा-ये सब पुरानी बात है,
इस दुःख में कोई तो तुम्हारे साथ है,
उन भाभी जी की हेल्थ-वेल्थ भी बताइये,
खामखाह को रोने वाला राग मत सुनाइये.
वो बोले-
उनकी तो हेल्थ ही हेल्थ है,
वेल्थ के लिए तो सालों से झटके खा रहे हैं,
आम की उम्मीद लिए बबूल में लटके जा रहे हैं.
इतनी मुसीबतें ना होतीं,
तो हम भी आज खाते पीते,
और एक दिन ड़ायबटीज के पेशेंट हो जाते,
कम से कम कहने को तो होता,
कि हमारा भी एक फैमिली डॉक्टर है,
स्टील की तिजोरी है,
दो मंजिला घर है,
लक्ष्मी को उंगली पर नचाते
और लोगों की आँखों में धूल झोंक-झोंक कर इन्कम-टैक्स चुराते.
मगर यहाँ तो इन्कम ही नहीं,फिर टैक्स क्या चुराएं.
चुराने के नाम पर उधारी वालों से आँखें चुराएं.
मगर अब,उधारी वाले भी इतने कसाई हो गए हैं,
की हम उनकी नज़रों में,
बकरे के भाई हो गए हैं.
सरकार भी क्या करे?
किस किस को पकडे?
जिसे देखो वही कुछ न कुछ खा रहा है,
व्यापारी सामान खा रहा है,
ठेकेदार पुल और मकान खा रहा है,
धर्मात्मा दान खा रहा है,
बेईमान ईमान खा रहा है,
और जिसे कुछ नहीं मिला,
वो आपके कान खा रहा है.
हमने कहा-यार बहुत बोलते हो.
बोले-बस यहीं बोल रहा हूँ.
घर पर तो बच्चों की माँ बोलती है,
सिंहनी की तरह सर पर डोलती है,
अरे,मेरी नज़र में तो ये दुनिया का सबसे बड़ा अपराध है,
और सच पूछो तो यही पूंजीवाद और समाजवाद के बीच फंसा "बकरावाद" है.
हमने पूछा-बकरावाद,बोले-हाँ,बकरावाद
कभी शेर की तरह दहाड़ते हुए बारात लाये थे,
और आज बकरे की तरह मिमियाँ रहे हैं.
फर्क सिर्फ इतना है,कि
"बकरा एक झटके में हलाल होता है,
और हम धीरे धीरे हुए जा रहे हैं,
और हम धीरे धीरे हुए जा रहे हैं."......
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