इस उपेक्षवादी युग में जी रहे जन-मानस में भाषायी ज्ञान के प्रति एक अजीब सा द्रष्टिकोण उत्पन्न होते देखा जा रहा है. "हिंदी अपनी भाषा है, इसको क्या सीखना.? अंतररास्ट्रीयता के इस दौर में हिंदी भाषा में दक्षता पाना कुंएं में तैरने के सामान है." वही दूसरी ओर "अंग्रेजी विदेशी भाषा है,यह जितनी आ जाए उतना ही पर्याप्त है. हमें कौन सा संयुक्त राष्ट्र के मंच पर जाकर वक्तव्य देना है."
उपर्युक्त द्रष्टिकोण पुर्णतः हमारे भाषाई उपेक्षा की कहानी को दर्शाता है. अनेक शिक्षित महानुभाव,हिंदी बोलते समय हिंदी और इसके समर्थकों पर एहसान सा करते हुए कहते हैं-मुझसे हिंदी तो आती नहीं,पर मैं आपके सामने टूटी-फूटी बोलने का प्रयत्न करता हूँ,आदि-आदि. ऐसा नहीं है कि ये लोग अंग्रेजी या किसी और भाषा के विशेषज्ञ हैं. ऐसा तो ये इस आडंबारपूर्ण समाज में खुद पर जमी धूल को छिपाने के लिए करते हैं. आधुनिकता कि इस अंधी दौड़ में हिंदी अपना वास्तविक रूप खोने लगी है. हम मानते हैं कि समय के साथ बदलाव भी निरंतरता का द्योतक है,पर परिवर्तन सही दिशा में भी तो होना चाहिए. आदिकाल से लेकर प्रगतिवाद/छायावादोत्तर युग तक भाषा कई रूपों में देखी और लिखी गयी,पर कही भी इसका मूल परिवर्तन नहीं हुआ. कुछ लोग तर्क देते हैं कि संक्रांति काल में सब स्वाभाविक है. अरे अगर हमारे कान, माथे पर लगा दिए जाएँ तो क्या लोगो को हम अपना चेहरा दिखा पायेंगे. आशय यह है कि मूल परिवर्तन होने से संकट का एक दौर शुरू हो जाता है जो हिंदी भाषा के क्रम में देखा जा सकता है.
राष्ट्रभाषा का मिश्रित होना उसके विकास अवं समृद्धि की प्रक्रिया का एक आवश्यक सोपान है. हिंदी भाषा के शब्द भण्डार में लगभग 45 प्रतिशत शब्द विदेशी हैं. वे मूल भाषा के साथ ऐसे घुल-मिल गए हैं कि अपने से लगते हैं. हिंदी ने अपने व्याकरण द्वारा उन्हें अनुशासित करके आत्मसात कर लिया है, किन्तु इसी के साथ भौंडे प्रयोगों द्वारा हिंदी का विकृत हुआ स्वरुप चिंता का विषय है. "मैं family को see-off करने स्टेशन गया", ऐसे प्रयोग किसी सीमा तक ग्राह्य हैं, पर "मैंने उससे ask किया", आदि हमारी भाषा को अपंग बनाते हैं. इस संकट के मुख्यतः दो कारण हैं- एक तो भाषायी नियमो के प्रति रूचि का अभाव और दूसरा भाषा के महत्त्व के प्रति लोगों की उदासीनता. वे इस तथ्य को नहीं समझ पाते कि परिनिष्ठित भाषा मानव के सभ्य होने का प्रमाण है और अपनी भाषा के प्रति उदासीनता वस्तुतः अपनी अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह लगाना है.
खूँटे से छूट जाने वाला पशु किसी भी दिशा में भटक सकता है, ठीक उसी प्रकार हिंदी के मूल रूप को खूँटे से छोड़ देने पर हम अपनी अस्मिता रूपी राष्ट्र भाषा के लिए बहुआयामी संकट स्थापित कर देंगे. भाषा के स्वरुप की विकृति के प्रति उदारता की प्रवृत्ति भारत को भाषा-विहीन असभ्य राष्ट्र बना देगी, जैसा की ब्रज की एक लोकोक्ति में कहा है- कि भीति ही नहीं, तो क्या छतें रह जाएंगी. उपन्यास, कहानी, कथा में भाषा की टूटन होती है क्योंकि यह चरित्र को उसके अनुरूप उभारने में मददगार होती हैं, पर टीवी या रेडियो का प्रसारणकर्ता अशुद्ध वाक्य कहे तो यह निश्चित ही भाषायी संकट है.
वर्तमान समय में हिंदी के विकास के नाम पर उसके स्वरुप को विकृत करने और उसकी अस्मिता को संकट में डालने का छद्म प्रयास किया जा रहा है. युवावर्ग को इस भाषायी षण्यंत्र के प्रति जागरूक होकर इसे बचाना होगा वरना आने वाली पीढ़ी पूछेगी कि हिंदी किस देश और कौम की भाषा है और हम निरुत्तर होंगे.
याद रहे! हिंदी भारतीय संस्कृति का प्राण-तत्त्व है.
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