Tuesday, 8 May 2012

काश ऐसे बदले ना होते!!!


                                        

वो मैदान की घास पर बैठकर हम
कभी दोस्तों संग,कभी बस अकेले 
वो मस्ती,ठिठोली,हँसाना और हँसना
वो दिन भर की सारी थकानें मिटाना
अगर साथ होते तो फिर से वहीँ पर
वो लम्हे पुराने जो गुजरे,बिताते
मगर साथ छूटा, तो फिर ना मिले तुम,
और अफ़सोस सारे हमे यूँ सताते,
सुलगता मेरा मन,जो आंसू सुखाकर
दिलाता मुझे याद सारे वो लम्हे.

थे तुम जो मेरे तब,वही आज होते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.......

हवाओं का रुख और मंजर बदलकर,
वो पत्ते सुकूं के कही दूर लेकर,
उड़े जो गगन में,तो पा ना सके हम
वो खुशियों के पल,एक पल भी जमीं पर
बिलखते हैं बरबस,वो सब याद करके
जो यादें नहीं एक पल थे अनोखे,
ना लौटेंगे पल वो,न लौटेंगी खुशियाँ
ना किस्से,कहानी,न प्यारी वो बतियाँ

तुम्हे इस तरह से कभी हम न खोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.....

वजह बेवजह थी,थे बेकार कारण
मगर मिल सका न उन्हें कुछ निवारण.
खुदगर्जी में खुद को पिरोते गए हम,
और उतना ही फिर दूर होते गए हम,
ना सोचा था हम पर भरोसा टिका है,
किसी का सभी कुछ हमी पर बिका है,
ना परवाह की और बढ़ते गए हम,
खुदी को जिताने में अड़ते गए हम,
वो नजदीकियां,दूरियाँ बन गयी जब,
तो अब जीत का जश्न कैसे मनाएं,
ये रंगत नयी सी है किस काम की अब,
जिन्हें खो चुका हूँ,उन्हें कैसे पाएं?

हसीं के नशीं परदे करके हैं रोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते,
                 कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते........................

Friday, 27 April 2012

हिंदी भाषा का संरक्षण


इस उपेक्षवादी युग में जी रहे जन-मानस में भाषायी ज्ञान के प्रति एक अजीब सा द्रष्टिकोण उत्पन्न होते देखा जा रहा है. "हिंदी अपनी भाषा है, इसको क्या सीखना.? अंतररास्ट्रीयता के इस दौर में हिंदी भाषा में दक्षता पाना कुंएं में तैरने के सामान है." वही दूसरी ओर "अंग्रेजी विदेशी भाषा है,यह जितनी आ जाए उतना ही पर्याप्त है. हमें कौन सा संयुक्त राष्ट्र के मंच पर जाकर वक्तव्य देना है."
उपर्युक्त  द्रष्टिकोण पुर्णतः हमारे भाषाई उपेक्षा की कहानी को दर्शाता है. अनेक शिक्षित महानुभाव,हिंदी बोलते समय हिंदी  और इसके समर्थकों पर एहसान सा करते हुए कहते हैं-मुझसे हिंदी तो आती नहीं,पर मैं आपके सामने टूटी-फूटी बोलने का प्रयत्न करता हूँ,आदि-आदि. ऐसा नहीं है कि ये लोग अंग्रेजी या किसी और भाषा के विशेषज्ञ हैं. ऐसा तो ये इस आडंबारपूर्ण समाज में खुद पर जमी धूल को छिपाने के लिए करते हैं. आधुनिकता कि इस अंधी दौड़ में हिंदी अपना वास्तविक रूप खोने लगी है. हम मानते हैं कि समय के साथ बदलाव भी निरंतरता का द्योतक है,पर परिवर्तन सही दिशा में भी तो होना चाहिए. आदिकाल से लेकर प्रगतिवाद/छायावादोत्तर युग तक भाषा कई रूपों में देखी और लिखी गयी,पर कही भी इसका मूल परिवर्तन नहीं हुआ. कुछ लोग तर्क देते हैं कि संक्रांति काल में सब स्वाभाविक है. अरे अगर हमारे कान, माथे पर लगा दिए जाएँ तो क्या लोगो को हम अपना चेहरा दिखा पायेंगे. आशय यह है कि मूल परिवर्तन होने से संकट का एक दौर शुरू हो जाता है जो हिंदी भाषा के क्रम में देखा जा सकता है.
राष्ट्रभाषा का मिश्रित होना उसके विकास अवं समृद्धि की प्रक्रिया का एक आवश्यक सोपान है. हिंदी भाषा के शब्द भण्डार में लगभग 45 प्रतिशत शब्द विदेशी हैं. वे मूल भाषा के साथ ऐसे घुल-मिल गए हैं कि अपने से लगते हैं. हिंदी ने अपने व्याकरण द्वारा उन्हें अनुशासित करके आत्मसात कर लिया है, किन्तु इसी के साथ भौंडे प्रयोगों द्वारा हिंदी का विकृत हुआ स्वरुप चिंता का विषय है. "मैं family को see-off करने स्टेशन गया", ऐसे प्रयोग किसी सीमा तक ग्राह्य हैं, पर "मैंने उससे ask किया", आदि हमारी भाषा को अपंग बनाते हैं. इस संकट के मुख्यतः दो कारण हैं- एक तो भाषायी नियमो के प्रति रूचि का अभाव और दूसरा भाषा के महत्त्व के प्रति लोगों की उदासीनता. वे इस तथ्य को नहीं समझ पाते कि परिनिष्ठित भाषा मानव के सभ्य होने का प्रमाण है और अपनी भाषा के प्रति उदासीनता वस्तुतः अपनी अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह लगाना है.

खूँटे से छूट जाने वाला पशु किसी भी दिशा में भटक सकता है, ठीक उसी प्रकार हिंदी के मूल रूप को खूँटे से छोड़ देने पर हम अपनी अस्मिता रूपी राष्ट्र भाषा के लिए बहुआयामी संकट स्थापित कर देंगे. भाषा के स्वरुप की विकृति के प्रति उदारता की प्रवृत्ति भारत को भाषा-विहीन असभ्य राष्ट्र बना देगी, जैसा की ब्रज की एक लोकोक्ति में कहा है- कि भीति ही नहीं, तो क्या छतें रह जाएंगी. उपन्यास, कहानी, कथा में भाषा की टूटन होती है क्योंकि यह चरित्र को उसके अनुरूप उभारने में मददगार होती हैं, पर टीवी या रेडियो का प्रसारणकर्ता अशुद्ध वाक्य कहे तो यह निश्चित ही भाषायी संकट है.

वर्तमान समय में हिंदी के विकास के नाम पर उसके स्वरुप को विकृत करने और उसकी अस्मिता को संकट में डालने का छद्म प्रयास किया जा रहा है. युवावर्ग को इस भाषायी षण्यंत्र के प्रति जागरूक होकर इसे बचाना होगा वरना आने वाली पीढ़ी पूछेगी कि हिंदी किस देश और कौम की भाषा है और हम निरुत्तर होंगे.
याद रहे! हिंदी भारतीय संस्कृति का प्राण-तत्त्व है.

Friday, 13 April 2012

हमारे ऐसे भाग्य कहाँ??.......

                          हमारे ऐसे भाग्य कहाँ??.......



एक दिन अकस्मात् 
एक पुराने दोस्त से हो गयी मुलाक़ात,
हमने कहा ,नमस्कार
वो बोले,गजब हो गया यार.
क्या खाते हो?,
जब भी मिलते हो,पहले से डबल नज़र आते हो.

हमने कहा छोड़ो भी यार,ये बताओ तुम कैसे हो?
बोले- गृहस्थी का बोझ ढो रहे हैं,
जीवन की बगिया में आंसू बो रहे हैं,
कर्म के धागों से फटे भाग्य को सी रहे हैं,
और अपने ही राज्य में बिना चीनी की चाय पी रहे हैं..

हमने पूछा-ड़ायबटीज है क्या,
बोले-हमारे ऐसे भाग्य कहाँ?
ड़ायबटीज जैसे राज रोग तो बड़े लोगों को होते हैं,
हम जैसे कंगालों को तो सिर्फ दुःख-दर्द होते हैं,
फिर पूछा- तुम्हारे क्या हाल हैं?
हमने कहा-हमे तो ड़ायबटीज है,
तुम क्या जानो कितनी बुरी चीज है?
बोले- बुरी है तो मुझे दे दो,
पर मुझसे ये परेशानियाँ ले लो.

हमने कहा-ये सब पुरानी बात है,
इस दुःख में कोई तो तुम्हारे साथ है,
उन भाभी जी की हेल्थ-वेल्थ भी बताइये,
खामखाह को रोने वाला राग मत सुनाइये.
वो बोले-
उनकी तो हेल्थ ही हेल्थ है,
वेल्थ के लिए तो सालों से झटके खा रहे हैं,
आम की उम्मीद लिए बबूल में लटके जा रहे हैं.
इतनी मुसीबतें ना होतीं,
तो हम भी आज खाते पीते,
और एक दिन ड़ायबटीज के पेशेंट हो जाते,
कम से कम कहने को तो होता,
कि हमारा भी एक फैमिली डॉक्टर है,
स्टील की तिजोरी है,
दो मंजिला घर है,
लक्ष्मी को उंगली पर नचाते
और लोगों की आँखों में धूल झोंक-झोंक कर इन्कम-टैक्स चुराते.

मगर यहाँ तो इन्कम ही नहीं,फिर टैक्स क्या चुराएं.
चुराने के नाम पर उधारी वालों से आँखें चुराएं.
मगर अब,उधारी वाले भी इतने कसाई हो गए हैं,
की हम उनकी नज़रों में,
बकरे के भाई हो गए हैं.

सरकार भी क्या करे?
किस किस को पकडे?
जिसे देखो वही कुछ न कुछ खा रहा है,
व्यापारी सामान खा रहा है,
ठेकेदार पुल और मकान खा रहा है,
धर्मात्मा दान खा रहा है,
बेईमान ईमान खा रहा है,
और जिसे कुछ नहीं मिला,
वो आपके कान खा रहा है.

हमने कहा-यार बहुत बोलते हो.
बोले-बस यहीं बोल रहा हूँ.
घर पर तो बच्चों की माँ बोलती है,
सिंहनी की तरह सर पर डोलती है,
अरे,मेरी नज़र में तो ये दुनिया का सबसे बड़ा अपराध है,
और सच पूछो तो यही पूंजीवाद और समाजवाद के बीच फंसा "बकरावाद" है.
हमने पूछा-बकरावाद,बोले-हाँ,बकरावाद
कभी शेर की तरह दहाड़ते हुए बारात लाये थे,
और आज बकरे की तरह मिमियाँ रहे हैं.

फर्क सिर्फ इतना है,कि 
"बकरा एक झटके में हलाल होता है,
और हम धीरे धीरे हुए जा रहे हैं,
और हम धीरे धीरे हुए जा रहे हैं."......

Monday, 14 November 2011

राजनीती: विकास और सच

राजनीती का नाम सुनते ही पहली तस्वीर जो हमारे मानस पटल पर उभरकर आती है वो है- खादी सफ़ेद  कपड़ो से सुसोभित काले कारनामो वाला नेता. 
हमारे लिए चीजे बिलकुल वैसी ही हो जाती हैं जैसा हमें उनके बारे में पता चलता है या जैसा हम उनके बारे में सोचने लगते हैं. यही दसा आज राजनीती की बन चुकी है. हमने अपने परिवेश से जो कुछ भी सीखा वो बस एक धारणा बनी बात है जो हमें इस पूरे सिस्टम से दूर रखने के लिए समझा दी जाती है. असल में राजनीती एक चुनौती है. मेरे लिए यह देश सेवा का सबसे बढ़िया रास्ता है. सीमा पर बन्दूक लेकर दुश्मन को मार गिराना ही देशभक्ति नही है. देश की रक्षा करना सिर्फ लड़ने का नाम नही है. देश में पल रहे लाखो भूखे लोगो के लिए रोटी नसीब करवाना कही बड़ी देशभक्ति है. हर साल फुटपाथ पर  भयानक ठण्ड में मर रहे लोगो के रहने के लिए मकान का इंतजाम करवाना बहुत बड़ी सेवा है. पर ....................



जारी है.............................

Wednesday, 9 November 2011

सच्चा भगवान्

परिवर्तन प्रकृति का शास्वत नियम है. हमारी इच्छाओं की बारिश में भीगकर कभी कभी अनायास ही कुछ परिवर्तन होने लगते हैं जिन्हें हम होने नही देना चाहते हैं. परन्तु फिर भी किसी मोड़ पर हमे ऐसा लगने लगता है की जो कुछ भी हुआ, कही ना कही हमारे भले क लिए ही हुआ है.
बचपन में हमारी हर एक पूछी गयी बात का हमारे माता पिता बहुत सलीके से सुलझा हुआ जवाब देते हैं और वही हम जब इस लायक होते हैं की उनको कुछ पूछने क लिए हमारी जरुरत महसूस हो तो हम उनके ओल्ड फैशन की कोई मूर्ति समझकर दांत डपट देते हैं. जिस घर में वो अपने ४ ५ बेटो को पाल पोसकर बड़ा करते हैं, वही चार पांच लोग समय आने पर इन दो बुजुर्गो को नही रख पाते.
मुझे समझ नही आता की आखिर क्यों हमारे अन्दर इतना परिवर्तन हो जाता है की हम अपने माँ बाप जो कभी हमारे आदर्श रहा करते थे, उन्हें इस कदर दुत्कारते हैं. घिन आती है ऐसे तथा कथित सामजिक लोगो पे जो समाज   और माता पिता को एक तराजू में रखकर अपने स्टेट्स को चुनते हैं.

परिवर्तन जरुरी है परन्तु तभी जब ये सही विचारों का हो, अन्यथा ये हमारे आने वाले समाज क लिए विसंकारी होंगे.  अगर आप ऐसे नही हैं तो मेरे लिए आपकी इज्जत बहुत ज्यादा है परन्तु अगर आप इनमे से किसी भी तरह अपने माता पिता को दुखी करते हैं तो मेरी आपसे प्रार्थना है की उन्हें अपना भगवान् मानिए. 
भगवान् आपको अपना मानेगा...........................

Thursday, 6 October 2011

पछतावा

हर उस रात जब हम न चाहकर भी नींद के आगोश में चले जाते हैं और फिर एक प्यारा सा सपना हमारी आँखों की पलकों पर संजो दिया जाता है तब शायद  प्रकृति के प्राक्रतमय होने का आभास यूँ ही मिल जाता सा प्रतीत होता है.
हमारा जीवन एक धूप में दौड़ भाग कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना ही नही होता बल्कि इसके तमाम और भी कार्य हैं. हम हर उस दिन को तो याद करना सीख जाते हैं जिनमे हमको कुछ प्राप्त हुआ परन्तु वो सारे दिन जो यूँ ही व्यर्थ चले गये उनका क्या? क्या वो कभी वापस आ पाएंगे  जिनके सायो में कभी हमने जीवन के कुछ अनजाने ही सही परन्तु अमूल्य पल गुजारे थे..........
आज शायद उनकी किसी को परवाह नही. कोई उन्हें याद नही करता परन्तु एक समय आने पर पछतावा ही बचेगा.............
तब तक तो मेरी राहें भी जुदा हो जाएँगी...........................................