हर उस रात जब हम न चाहकर भी नींद के आगोश में चले जाते हैं और फिर एक प्यारा सा सपना हमारी आँखों की पलकों पर संजो दिया जाता है तब शायद प्रकृति के प्राक्रतमय होने का आभास यूँ ही मिल जाता सा प्रतीत होता है.
हमारा जीवन एक धूप में दौड़ भाग कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना ही नही होता बल्कि इसके तमाम और भी कार्य हैं. हम हर उस दिन को तो याद करना सीख जाते हैं जिनमे हमको कुछ प्राप्त हुआ परन्तु वो सारे दिन जो यूँ ही व्यर्थ चले गये उनका क्या? क्या वो कभी वापस आ पाएंगे जिनके सायो में कभी हमने जीवन के कुछ अनजाने ही सही परन्तु अमूल्य पल गुजारे थे..........
आज शायद उनकी किसी को परवाह नही. कोई उन्हें याद नही करता परन्तु एक समय आने पर पछतावा ही बचेगा.............
तब तक तो मेरी राहें भी जुदा हो जाएँगी...........................................
nic one
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